कविताओं के माध्यम से रामकुमार सिन्हा के मन के उद्गार

कविताओं के माध्यम से रामकुमार सिन्हा के मन के उद्गार
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“तुम”

कविताओं के माध्यम से रामकुमार सिन्हा के मन के उद्गार श्री रामकुमार सिन्हा

ऋषभ हूँ, गंधार हूँ, मध्यम हो तुम।

राग का आलाप मैं, सरगम हो तुम।

       

गंगा-जमन की धार तुम,बंजर जमीं मैं।  

तुम सुरीली तान केवल बाँसुरी मैं।  

    

तुम हो शीतल चाँद, मैं दोपहर हूँ।        

मैं घना कुहरा मगर शबनम हो तुम। 

     

राग का आलाप मैं, सरगम हो तुम।       

मैं धधकती लौ,दीये की आरती तुम।  

 

राही मैं प्यासा हूँ, चंचल नदी तुम।        

मैं हूँ झंझावात, हवा हो तुम बसंती।    

 

प्रेम का प्रतिरूप मैं, रूपम हो तुम।    

राग का आलाप मैं, सरगम हो तुम।

 

(कवि परिचय – श्री रामकुमार सिन्हा पेशे से तो गिरिडीह नगर निगम का हिसाब किताब रखते हैं, या पद का नाम लें तो बड़ा बाबू हैं, पर मूल रूप से ये एक कवि और कलाकार हैं। छात्र जीवन से ही लेखन में हाथ आजमा रहे रामकुमार सिन्हा एक उम्दा कलाकार भी हैं और इनका पसंदीदा वाद्य यंत्र बाँसुरी है। ” मैं एक समंदर हूँ ” और ” मैंने देखा है जहां ” शीर्षक से अब तक इनकी कविताओं के दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिन्हें पाठकों ने काफी सराहा भी है।)

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