पुलिस की आत्मसमर्पण नीति से माओवादी संगठन को मिला जबरदस्त झटका

पुलिस की आत्मसमर्पण नीति से माओवादी संगठन को मिला जबरदस्त झटका
  •  
  •  
  •  
  •  
  • 6
  •  
  •  
    6
    Shares

छः माह में पीरटांड़ के दो कुख्यात माओवादियों को कराया आत्मसमर्पण

डेढ़ दशक से संगठन में सक्रिय था पीरटांड़ का माओवादी बलबीर महतो

रिपोर्ट: मनोज कुमार पिंटू/ रिंकेश कुमार

गिरिडीह। पुलिस की आत्मसमर्पण नीति से एक ओर जहां कई कुख्यात माओवादी मुख्यधारा में लौट रहे हैं, वहीं पुलिस की इस नीति से माओवादी संगठन को लगातार झटके मिल रहे हैं। छः माह में पीरटांड के दो हार्डकोर माओवादियों को आत्मसमर्पण कराकर गिरिडीह पुलिस ने इलाके के माओवादी संगठन को जबरदस्त झटका दिया है। छः माह पहले जहां बाबूचंद मंराडी उर्फ सूरज मंडल ने गिरिडीह पुलिस के समक्ष सरेंडर किया था, वहीं छह माह बाद गुरुवार को पीरटांड के नावाडीह गांव निवासी बलबीर महतो उर्फ रौशन दा उर्फ विपुल दा उर्फ प्रेमचंद महतो उर्फ दीपक उर्फ चरका का आत्मसमर्पण कराकर पुलिस ने नक्सली संगठन की कमर तोड़ने में सफलता पाई है।

छः माह में जिन माओवादियों को सरेंडर कराया गया है वह दोनों संगठन में काफी कुख्यात माने जाते है। बाबूचंद के नाम भी दर्जन भर नक्सली केस दर्ज हैं। वहीं गुरुवार को सरेंडर करने वाले माओवादी सह पूर्वोतर बिहार के स्पेशल एरिया कमिटी सैक सदस्य बलबीर महतो पर तो जिस संख्या में नक्सली केस दर्ज हैं, वे बलबीर को कुख्यात नक्सली साबित करने के लिये काफी हैं।

नक्सली बनने के पूर्व मुंबई में करता था वेटर का काम

पुलिस की आत्मसमर्पण नीति से माओवादी संगठन को मिला जबरदस्त झटका

बलबीर महतो के नक्सली बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। नावाडीह स्थित अपने घर में 15 साल पहले हुए घरेलू विवाद के बाद बलबीर गुस्से में मुंबई कमाने चला गया। मुंबई में 5 साल तक वैटर का काम करने के दौरान हुए मारपीट की घटना के बाद बलबीर वापस पीरटांड़ लौट आया था। साल 2004 में दुबारा पीरटांड़ पहुंचने के बाद बलबीर बगोदर क्षेत्र के नक्सली तिलकधारी महतो के माध्यम से संगठन से जुड़ गया।

सक्रियता के कारण संगठन में बड़ता गया कद

संगठन से जुड़ने के बाद संगठन ने बलबीर को झाझा के चक्रधपुर में सहदेव सौरेन उर्फ अनुज दा के पास भेजा दिया। झाझा में ही बलबीर ने जमुई के एरिया कमांडर प्रकाश यादव के दस्ते में काम किया। साल 2005 में बलबीर को एरिया कमेटी का सदस्य बनाया गया। इसी बीच साल 2006 में जमुई के चन्द्रमुंडी पुलिस ने बलबीर को गिरफ्तार करने में सफल रही। चार साल जेल में रहने के बाद 2011 में दुबारा बलबीर संगठन से जुड़ा।

जानकारी के अनुसार बलबीर ने साल 2012 में जमुई के हार्डकोर माओवादी रामचन्द्र महतो उर्फ चिराग दा के नेतृत्व में गिरिडीह में कैदी वाहन पर हमले की घटना को अंजाम दिया था। इस वारदात को चिराग और बलबीर के अलावे दर्जन भर माओवादियों ने मिलकर अंजाम दिया था। जिसमें अरविंद उर्फ अशोक यादव, सुरेश कोड़ा, सिद्धु कोड़ा, पिंटू राणा, मनोज उर्फ बड़का समेत कई जमुई और गिरिडीह के कई माओवादी शामिल थे।

कैदी वाहन ब्रेक कांड व 2011 में खैरा पुलिस के साथ मुठभेड़ समेत कई घटनाओं में सक्रियता से शामिल होने के बाद संगठन ने उसे बड़ी जिम्मेवारी देते हुए पूर्वोतर बिहार के स्पेशल एरिया कमेटी का सदस्य बना दिया।

मोनिका से किया था प्रेम विवाह

सैक सदस्य बनने के बाद बलबीर जमुई की हार्डकोर महिला नक्सली मोनिका से शादी कर लिया। मोनिका से शादी के कुछ दिनों बाद मोनिका ने संगठन से नाता तोड़ते हुए जमुई पुलिस के समक्ष सरेंडर कर दिया था। मोनिका के सरेंडर करने के बाद वह लगातार बलबीर पर भी सरेंडर करने का दबाव बनाने लगी। जिसके बाद बलबीर ने मोनिका को तलाक दे दिया था।

महिला कैडरों के साथ हो रही ज्यादती को देख छोड़ा संगठन

संगठन में हो रहे प्रताड़ना की कहानी सुनाते हुए बलबीर ने बताया कि अब संगठन में जब भी किसी नई महिला कैडर को जोड़ा जाता है तो उसका शारीरिक शोषण भी खूब किया जाता है। बताया कि संगठन के शीर्ष नेता नई महिला कैडर के साथ ज्यादती करने में भी नहीं हिचकते। संगठन के दिनोंदिन काला होते चेहरे के बाद उसने संगठन छोड़ने का निर्णय लिया।

ख़बरों से अपडेट रहने के लिए जुड़े हमारे व्हाट्सएप ग्रुप एवं फेसबुक पेज से….