क्यों खास है उनका कमरा, बता रहे हैं कवि ध्रुव गुप्त

क्यों खास है उनका कमरा, बता रहे हैं कवि ध्रुव गुप्त
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मेरा कमरा / ध्रुव गुप्त

 

 

 

 

यह मेरा अपना कमरा है 

जहां मैंने जीवन के

बीस-पचीस साल बिताए हैं

और शायद इसी कमरे में

मर जाऊंगा किसी दिन चुपचाप 

 

मुझे अपने कमरे से प्यार है

यहां मेरी प्रिय हजारों किताबें हैं

जिनके गंध के बीच मैंने

जीवन के बेहतरीन साल गुजारे  

मेरी किताबों की पांडुलिपियां हैं 

मेरी अनगिनत अधूरी कविताएं

जिन्होंने दुनिया नहीं देखी  

पुरानी किताबों में जतन से छुपाए

जवानी के कुछ प्रेमपत्र

और उनमें गुलाब की सूखी पत्तियां

खुशियों के ढेर सारे पल

मेरे बेशुमार दुख

आंसुओं से कई बार भींगा मेरा तकिया 

और एक आदमकद आईना

जिसमें जीवन भर झांकने के बावजूद

मैं खुद को पहचान नहीं पाया

 

मरने के बाद अगर मैं प्रेत बना 

तो अपनी असंख्य अधूरी इच्छाएं लिए

इसी कमरे में भटकन चाहूंगा

अनंत काल तक

मरने के बाद अगर कुछ नहीं बचता

तो मेरा दुख यह है कि

मेरे लिए यह कमरा भी मर जाएगा

और मर जाएगी

इसकी जानी-पहचानी गंध

 

इतनी बड़ी दुनिया में

सिर्फ मेरा कमरा मुझे जानता है  

मगर बोलता नहीं कुछ

या शायद मैं ही नहीं समझ पाता

उसकी बेजुबान भाषा

वरना एक बार पूछता उससे जरूर 

कि जब मैं नहीं रहूंगा

और उसके भीतर से धीरे-धीरे

मिट जाएगी मेरी देह-गंध 

क्या तब भी उसे याद आएगी मेरी !

कवि परिचय : बिहार के गोपालगंज के ध्रुव गुप्त भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं। बावजूद इसके इन्होंने अपने अंदर एक संजीदा कवि और लेखक को जीवित रखा. साहित्य जगत में इन्हें कवि, ग़ज़लगो, कथाकार और लेखक के रूप में जाना जाता है। विभिन्न विधाओं में इनकी अब तक छह किताबें प्रकाशित हो चुकी है। सेवानिवृत्ति के बाद पटना में रहकर साहित्य सेवा में लगे हैं।

मोबाइल : 09934990254

ईमेल : dhruva.n.gupta@gmail.com

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