आरक्षण पर न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी से ओबीसी समाज हतप्रभ: राजेश
झारखंड

आरक्षण पर न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी से ओबीसी समाज हतप्रभ: राजेश

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड राज्य के एक मसले पर की थी टिप्पणी

रांची। सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड राज्य के एक मसले पर एससी, एसटी व ओबीसी के आरक्षण पर राज्य अपने मर्जी से फैसला करें व कोर्ट इस पर कोई फैसला नही करेगा टिप्पणी की गई थी। जिसका तात्पर्य है कि राज्य सरकार चाहे तो आरक्षण दे सकती है और नहीं चाहे तो नहीं दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस टिप्पणी से एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी समुदाय हतप्रभ है। उक्त बातें राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार गुप्ता ने कही। कहा कि संविधान की धारा 15(4), 16(4) की मूल भावना को कोर्ट के फैसले ने पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। जबकि पिछड़े वर्ग को शिक्षा, सेवा पदांे में प्रतिनिधित्व ये संविधान के सामाजिक न्याय के मौलिक सिद्धांत का प्राण है। जिसे न्यायालय के द्वारा नजर अंदाज किया गया है।

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केन्द्र सरकार से की संसद में बहस कराने की मांग

कहा कि राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा का मानना है की बड़े न्यायालयों में जजों की नियुक्ति प्रतियोगिता से ना होकर कॉलेजियम सिस्टम से होने के कारण जज अपना मनमाना निर्णय बहुसंख्यक समाज पर जनतंत्र के स्तंभ के नाम पर थोपने का कार्य कर रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग करते हुए कहा कि न्यायालय द्वारा आरक्षण के मामले में दिये इस फैसले के विरुद्ध संसद में बहस करे व आरक्षण से संबंधित सरकारी फरमान को कानूनी अमलीजामा पहनाते हुए उसे नौवीं सूची में डाले। ताकि इसमें कोई छेड़छाड़ ना कर सके।

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