और बुझ गया झारखण्ड का रौशन चिराग
गिरिडीह झारखंड बगोदर राजनीति

और बुझ गया झारखण्ड का रौशन चिराग

और बुझ गया झारखण्ड का रौशन चिराग

रिपोर्ट- आबिद अंजुम

गिरिडीह। वर्ष 2005 की शुरुआत झारखण्ड की गरीब जनता खास कर गिरिडीह जिला वासियों के लिए बेहद दर्दनाक साबित हुआ था। 2005 के आरम्भ होते ही यहाँ की गरीब जनता को दर्द व गम का ऐसा तोहफा मिला जो सभी को रुलाने का काम कर गया था और झारखण्ड वासियों को गम के समंदर में डुबो गया था। मैं सोलह जनवरी 2005 की बात कर रहा हूँ। 16 जनवरी 2005 झारखण्ड के इतिहास में एक काला दिन बन कर आया था। क्योंकि इसी दिन झारखण्ड के एक रौशन चिराग को हमेशा हमेशा के लिए बुझा दिया गया था। 16 जनवरी 2005 को झारखण्ड राज्य के गिरिडीह जिला के सरिया थाना क्षेत्र में एक ऐसी आंधी आई थी, जिसने झारखंड राज्य के एक जलते दीपक को बुझा दिया था। जिस दीपक के बुझते ही पूरे क्षेत्र में एक घनघोर अंधेरा छा गया था। इस अंधेरे में सैकड़ों ही घरों की रोशनी गुम हो गई थी और चारों तरफ एक मातमी सन्नाटा पसर गया था। तब से यह दिन झारखण्ड के इतिहास में एक वीर सपूत के शहादत दिवस के रूप में जाना जाता है।

महेंद्र सिंह की हत्या सैंकड़ो उम्मीदों की हत्या

और बुझ गया झारखण्ड का रौशन चिराग

मैं माले विधायक स्वर्गीय महेंद्र प्रसाद सिंह की बात कर रहा हूं। जिनकी हत्या इसी दिन सरिया थाना के दुर्गी धवाईया गांव में कर दी गई थी। स्वर्गीय सिंह की निर्मम हत्या सिर्फ एक व्यक्ति या एक विधायक की हत्या नहीं थी, बल्कि झारखंड राज्य के एक बेबाक, निडर और जुझारू नेता की हत्या थी। सैकड़ों उम्मीदों की मौत, हजारों आशाओं की हत्या थी। हजारों- लाखों उन सपनों का टूट कर बिखर जाना था, जिन्हें स्वर्गीय सिंह ने गरीबों दलितों और पीड़ितों के आंखों में सजाया था। जुल्म और भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली उस आवाज की हत्या थी, जिससे जुल्म थर्राती थी और जिस पर दलितों शहीदों को नाज़ था। गरीबों बेसहारों के हक व न्याय के लिए उठने वाली उस आवाज की हत्या थी जिससे लाखों गरीबों बेसहारों को न्याय की आस रहती थी। झारखंड राज्य के एक ऐसे वीर सपूत की हत्या थी जो अपने क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरे झारखंड का गौरव था।

शोषितों की आवाज़ माने जाते थे महेंद्र सिंह

और बुझ गया झारखण्ड का रौशन चिराग

स्वर्गीय सिंह की हत्या एक ऐसे व्यक्तित्व को खो देना है, जिनकी विचारों का कोई मोल नहीं है। जिनकी शब्द रचना जिनके वाक्यों तथा धारा प्रवाह को सुनकर सदन में भी चारों तरफ सन्नाटा पसर जाता था। जिनकी आवाज दलितों और शोषितों की हक की आवाज बन कर गूंजती थी। जिनकी न्याय प्रियता और सादगी ही उनकी पहचान थी। जिन्होंने बहुत कम समय में ही गरीबों दलितों और शोषितों के दिलों पर राज करना शुरू कर दिया था। जो 1990 में पहली बार विधायक चुने जाने के बाद अपनी जिंदगी भर जनता जनार्दन के दिल में बसे रहे और आखिरी समय तक विधायक बने रहे।

राजनीति में अलग थी स्व सिंह की पहचान

स्वर्गीय सिंह एक ऐसे राजनेता थे, जो अपने हितों और कुर्सी के लिए राजनीति नहीं किया करते थे। वह गरीबों दलितों और पिछड़ों के नेता थे। वह शोषित पीड़ितों को न्याय दिलाने की राजनीति करते थे। 1978 से उन्होंने सक्रिय राजनीति में आने के बाद अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। जिसे आज भी क्षेत्र की जनता याद करती है।आज जब झारखंड की धरती का वह वीर सपूत धरती मां के आंचल में समा चुका है तो ऐसे में हजारों गरीब जनता जिनका सपना अधूरा रह गया वह अपना सब कुछ लूटा सा महसूस करते हैं और उनके दिलों से शिवाय आह के कुछ भी नहीं निकलता है। स्वर्गीय सिंह की हत्या के बाद आज भी लोगों के मन में सिर्फ एक ही बात कौंध रही है कि कौन था वह जिसने उनके प्रिय नेता को उनसे छीन लिया।

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जननायक को नहीं भूल पाएगी जनता

स्वर्गीय सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे परंतु उनकी याद हमेशा जिला वासियों के साथ रहेगी। उनकी खुशबू हर गरीब दलित बल्कि तमाम झारखंड वासियों के दिल में हमेशा हमेशा समाई रहेगी क्योंकि उनकी हत्या झारखंड की गरीब जनता की खातिर शहादत है। झारखंड की जनता स्वर्गीय सिंह की शहादत को कभी नहीं भुला पाएगी। उनकी कमी हर वैसे मोड़ पर महसूस होती रहेगी जहां न्याय और अन्याय का सामना होगा। जहां गरीबों और शोषितों के हित के लिए लड़ने की जरूरत आन पड़ेगी। जहां जुल्म और भ्रष्टाचार अपनी सीमा लांघता दिखेगा। ऐसे में जब भी स्वर्गीय सिंह की याद झारखंड के गरीब गुरबों को सताएगी तो सभी की आंखें नम हो जाएगी और दिल से बस एक ही सदा निकलकर जुबां पर आएगी झारखंड के वीर सपूत तुम्हें लाखों सलाम तुम्हें बार-बार नमन।

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