महेंद्र सिंह : क्रांतिकारी बिसात का साहसी योद्धा..
गिरिडीह जमुआ झारखंड

महेंद्र सिंह : क्रांतिकारी बिसात का साहसी योद्धा..

16 जनवरी : शहादत दिवस पर विशेष

रिपोर्ट: कंचन सिन्हा

जमुआ(गिरिडीह)। वर्ष 1978 के गर्मियों में सरिया-बगोदर के चौक-चौराहों पर एक दुबले- पतले पर मजबूत कदकाठी के एक युवक की गंभीर आवाज अनायस ही लोगों खासकर छात्र-नोजवानों को आकर्षित करने लगी थी। …मैं हूं महेंद्र सिंह प्रादेशिक जनवादी अग्रगामी मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष..। लंच ब्रेक अथवा स्कूल खत्म होने के बाद कई छात्र और स्थानीय युवक महेंद्र सिंह के इर्द-गिर्द जमा हो जाते थे (इन पंक्तियों का लेखक तब एस आर एस एस आर हाई स्कूल सरिया में 9वीं कक्षा का छात्र था)।  महेंद्र सिंह गांधीवाद से लेकर मार्क्सवाद तक की चर्चा बातचीत में करते थे। जेपी आंदोलन में छात्रों की भूमिका, धर्मवीर भारती और कमलेश्वर के लेखों की चर्चा के बीच शासन सत्ता की भी चर्चा महेंद्र सिंह करते थे। धीरे-धीरे छात्र- नोजवानों के बीच महेंद्र सिंह एक जाना पहचाना नाम बन गया। महेंद्र सिंह की गंभीर आवाज अब कड़कने लगी थी। यही कड़कती आवाज बाद में सरिया बगोदर की पुरी फ़िजा फ़िजा में गूंजने लगा।

शोषितों और पीड़ितों की आवाज़ बनकर उभरे महेंद्र सिंह

वर्ष 1980 में एक बलात्कार की घटना के विरोध में बगोदर होकर गुजरने वाली जीटी रोड को लगातार 17 घँटे तक जाम कर महेंद्र सिंह ने तो शासन प्रशासन की चूलें हिला दी थी। इस दौर में ही महेंद्र सिंह की पहचान गरीब- गुरबों, शोषित पीड़ित, अन्याय, अत्याचार और भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने वाले एक जननायक के रुप मे होने लगी थी। लोकतंत्र में उनकी गहरी आस्था थी और एक आदर्श कम्युनिस्ट नैतिकता का जीवन व्यवहार उन्हें खास बनाता गया। मार्क्सवाद के सूत्रों को देसी उद्धरणों से आमजनों तक पहुचाने की कला वे बखूबी जानते थे और एक जननायक की तरह  गंभीर विषयों की सहज व्याख्या करने में माहिर थे। यह नायकत्व उस कालखंड में बना जब राजनीति के मायने गरीबों और वंचितों के लिए बदल गए थे।

ख़बरों से अपडेट रहने के लिए जुड़े हमारे व्हाट्सएप ग्रुप एवं फेसबुक पेज से….

लड़ते रहे गरीब गुरबों के हक़ की लड़ाई

महेंद्र सिंह ने सामंतवादी मिजाज, प्रवृत्ति एवं प्रक्रिया का सजग प्रतिरोध किया। उन्होंने प्रतिवाद के अनेक नए रूप गढ़े औऱ तत्कालीन समस्याओं से लड़ने का तरीका भी रचा। जल-जंगल-जमीन पर वर्चस्व किसका हो, इस सम्बंध को उन्होंने मार्क्सवादी दर्शन से जोड़ा। झारखंड बनने के बाद महेंद्र सिंह और भी ज्यादा मुखर हुए थे। गिरिडीह के तेलोंडीह, बदडीहा से लेकर रांची के डोरंडा, तपकरा, कोयलकारो में हुए पुलिसिया उत्पीड़न के विरोध में न सिर्फ सबसे पहले घटना स्थल पर पहुँचे बल्कि पुलिस दमन पर तीखा हमला भी किया। दमन के खिलाफ उन्होंने ऐसी आवाज उठाई जिसकी गूंज दूर तक गई। झारखंड मे जनतंत्र की हिफाजत के लिए महेंद्र सिंह ने व्यापक संघर्ष की रहनुमाई की।

ता उम्र जनता के दिलों में किया राज

1978 से सक्रिय राजनीति में महेंद्र सिंह का जन्म गिरिडीह जिला के बगोदर प्रखंड स्थित खम्भरा गांव ने 22 फरवरी 1954 को हुआ था। जगदीश सिंह और प्रमिला देवी इनके माता पिता थे। गांव में ही सातवीं तक शिक्षा प्राप्त महेंद्र से किताबों से पक्की यारी रखते थे। दर्शन, साहित्य, अर्थशास्त्र और राजनीतिक किताबों में गहरी रुचि रखने वाले महेंद्र सिंह ने इन विषयों में मजबूत पकड़ बनायी। भाकपा माले(लिबरेशन) के झंडे तले बगोदर और पुरे गिरिडीह जिले में सघन राजनीतिक आंदोलन को संगठित कर उसका नेतृत्व भी किया। गरीब गुरबो की लड़ाई हमेशा आगे रहकर जनवादी अधिकार के लिए जनांदोलनों को और तीखा किया। 1990 में आइपीएफ के बैनर से महेंद्र सिंह पहली बार बगोदर के विधायक बने और अपनी शहादत तक विधायक बने रहे।

अमर है महेन्द्र सिंह की विचारधारा

बहरहाल जब एक छोटी ताकत मजबूत होती है और लोकतंत्र को व्यापक बनाने मे साहस के साथ अपना सबकुछ न्यौछावर कर देती है। वर्चस्ववादी ताकते खतरा महसूस करने लगती है, तब यह महसूस करना जरूरी है कि महेंद्र सिंह की विचारधारा से किसे नुकसान हो रहा था। प्रतिक्रिया वादी और भ्रष्ट ताकतों को ध्वस्त कर लोकतंत्र के प्रसार के उनके एजेंडों के दुश्मन कौन थे। क्या वही महेंद्र सिंह की हत्या के साजिशकर्ता तो नहीं? महेंद्र सिंह के विचार झारखंड के खेत खलिहानों के साथ न्याय पसंद और संघर्ष शील जनता के अरमानों में अब भी जीवित हैं।

सीधी नजर देखें सिटी केबल के 277 नम्बर और हमारे youtube चैनल पर