जीतिया (जीवित पुत्रिका व्रत) पर्व विशेष : सिर्फ पुत्र ही क्यों, पुत्रियों के लिए भी हो मंगलकामना
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जीतिया (जीवित पुत्रिका व्रत) पर्व विशेष : सिर्फ पुत्र ही क्यों, पुत्रियों के लिए भी हो मंगलकामना

जीतिया (जीवित पुत्रिका व्रत) पर्व विशेष : सिर्फ पुत्र ही क्यों, पुत्रियों के लिए भी हो मंगलकामना महेंद्रनाथ गोस्वामी “सुधाकर”

संस्कृत के किसी कवि ने कहा है – “जायते हरेत दारा बृद्धमाने च हरेत धनं, मृयमान हरे प्राणम, पुत्र कुत्र सुखावह ?” अर्थात्- जन्म लेते ही पुत्र अपने पिता से उसकी पत्नी को छीन लेता है और वृद्ध हो जाने पर उसका अर्जित धन स्वयमेव उसके हाथ आ जाता है तथा दुर्योग से यदि पिता के जीवित रहते ही पुत्र की मृत्यु हो जाती है तो पिता प्राणहीन प्राय हो जाता है – अत: पुत्र कब सुख देनेवाला हुआ ? अर्थात् – कभी नहीं ! परन्तु आज भी रुढ़िवादी अंधी परंपराओं में जकड़े हुए अनेकों जातियों, समुदायों में यह बात निर्विवाद रूप में क़ायम है कि पुत्र ही वंश चलाने वाला, कुल को बढ़ाने वाला होता है। भले ही वह अपने कार्यों से खानदान की नाक कटवा डाले! बेशक कुलघाती हो जाए! चाहे क्यों न वह पुरखों की संपत्ति को जुए, शराब आदि कुव्यसनों में होम कर डाले ! रहेगा तो बेटा ही! अतः जन्म से ही उसे पुत्रियों की अपेक्षा अधिक लाभ के अवसर मिलने चाहिए। जबकि विधाता ने पुत्र एवं पुत्रियों, दोनों को ही समाज में बराबर की भागीदारी दी है। म०स्म०/श्लो० सं० – 119 के अनुसार – प्रजननार्थ स्त्रय: सृष्टा:, संतानार्थ च मानवा://अर्थात् – ईश्वर ने प्रजनन के लिए स्त्रियों की सृष्टि की है तथा संतान के लिए पुरुषों का सृजन किया है। परन्तु आज भी लोग जहां पुत्रियों को केवल पराया धन “वस्तु” मानकर उसके प्रति पक्षपात तथा उपेक्षापूर्ण व्यवहार करते हुए उन्हें एक बोझ मान रहे हैं – वहीं पुत्रियों को अपने जन्तदाताओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील देखा जाता है। पुत्रियों का संबंध अपने जन्मदाताओं के लिए जिन कोमल, स्नेहिल भावनाओं से भरा होता है वह शब्दों में नहीं लिखा जा सकता।

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जीतिया (जीवित पुत्रिका व्रत) पर्व विशेष : सिर्फ पुत्र ही क्यों, पुत्रियों के लिए भी हो मंगलकामना

उपरोक्त श्लोक के अतिरिक्त पुत्र जहां एक ओर स्कूल कालेजों से घर आने के बाद अपने अधिकांश समय घर के बाहर मित्रों के साथ व्यतीत करते हैं वहीं दूसरी ओर पुत्रियां अपनी पढ़ाई के अतिरिक्त समय को घर में मां के साथ कार्यों में हाथ बंटाने को उत्सुक रहतीं हैं । इसके साथ ही बाबू जी, आपके सिर की मालिश कर दूं क्या,,? पापा,, आपकी कमीज प्रेस कर दूं ? पिता जी,, रुकिए,, आपकी कमीज की बटन टूट गई है,, मैं टांक देती हूं,,,! वगैरह-वगैरह ! इतना ही नहीं बल्कि बेटियां,, जो कभी भी अपने जन्मदाताओं की थोड़ी सी भी आलोचना तक सुनने को तैयार नहीं रहती,, जिन्हें सदैव अपने जन्मदाताओं पर गर्व रहता है और जो पराये घर में जाने के बाद भी स्वयं के भीतर एक ऐसा भाव छिपाए रहती हैं – यह जानकर भी कि, वह “पराया धन” थी और अब उसके साथ अपने घर में जो थोड़ा प्यार-दुलार मिलता था,, वह कम होता जाएगा – उसके हृदय में स्नेहिल भावनाओं की डोर अपने जन्मदाताओं से दूर रहकर उनके प्रति और भी मजबूत होती जाती है, तथा उनकी वही भावनाएं आवश्यकता पड़ने पर अपने माता-पिता की सहायता करने के लिए व्याकुल कर देती है। सारा संसार यदि उसके माता-पिता का विरोधी हो जाए तो भी पुत्रियां सदैव अपने जन्मदाताओं का पक्ष लेंगी।

संसार में सभी महापुरुषों को जन्म देने वाली भी किसी न किसी की पुत्रियां ही थीं तथा गार्गी, मैत्रेयी, अरुंधती, दुर्गावती, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला आदि भी किसी न किसी की पुत्रियां थीं, जिन्होंने न केवल अपने कुल का नाम रौशन किया बल्कि सारे विश्व में भारत का नाम ऊंचा कर दिया। परन्तु हाय रे देश का दुर्भाग्य ! जिस देश की पुत्रियों ने ऐसे-ऐसे कार्य किए हैं कि, जिन्हें जानकर दुनिया दांतों तले उंगलियां दबा लें – उसी देश के लोगों में अपनी पुत्रियों के प्रति उपेक्षापुर्ण व्यवहार! वे यह समझना ही नहीं चाहते कि बेटी भी सराहना और स्नेह की उतनी ही हकदार हैं जितना कि बेटे ।

आज पुरातनपंथी ब्राह्मणवादी कुव्यवस्थाओं के चक्रव्यूह में फंसकर अनेकानेक जाति समुदाय की माताएं केवल अपने पुत्रों के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना हेतु जीतिया पर्व जैसे व्रत उपवास आदि करती हैं किन्तु अपनी पुत्रियों के लिए मंगलकामना अथवा उनके कल्याण के लिए कभी किसी ने किन्ही माताओं को नहीं कहा ! जबकि बेटों के साथ बेटियों की भी माता होने के कारण जन्मदाताओं को दोनों के लिए एक जैसा ही दायित्व बोध होना चाहिए।

आज तक बेटियों के दीर्घायु अथवा मंगलकामना हेतु किसी माता पिता ने कोई व्रत उपवास करना उचित नहीं समझा,बल्कि इस “पराये धन” का अल्ट्रासाउंड मशीनों द्वारा पता लगवाकर उसका सफाया करने में आज कल की पढ़ी-लिखी, शिक्षित माताओं को भी कोई झिझक अथवा आत्मग्लानि का बोध नहीं होता है।

प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला पर्व – जीवित पुत्रिका व्रत, एक ऐसा ही व्रत है, जिसमें माताएं केवल अपने जीवित पुत्रों के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन की कामना से करतीं हैं, जिसमें माताएं चौबीस घंटों के उपर बिना अन्न जल ग्रहण किए बड़ी कठोरता से नियमों का पालन करते हुए उपवास करती हैं। इस व्रत का नाम – “जीवित पुत्रिका व्रत” है। देखा जाए तो व्रत के नाम और उसके उद्देश्यों में विरोधाभास झलकता है क्योंकि, जीवित पुत्रिका व्रत, मूर्त्ति भेद से विभिन्न नामों से विख्यात- माता दुर्गा ही अमृत प्राप्त करने के अर्थ में जीवित पुत्रिका कहलाती है :– “दुर्गाया मूर्तिभेदेन ख्याता त्रैलोक्य पूजिता अमृत हरणे वत्समृतास्याजाजीवितं पुत्रिकाम” – इस तरह के अर्थों में माता दुर्गा जो जगत जननी सभी की माता है – क्या उसकी अपनी सभी संतानों में पुत्रों अथवा पुत्रियों का कोई भेद भाव हो सकता है? कदापि नहीं ! जिस तरह जगत जननी मैया दुर्गा की कुमारी कन्याओं में उनका ही प्रतिरूप मानकर पूजा की जाती है उसी मां दुर्गा की संतानें (पुत्रियों की माताएं), अपनी संतानों में भेद भाव बरतें और केवल अपने पुत्रों के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना करें , केवल पुत्रों के हित साधन हेतु व्रत उपवास रखें,, यह एक विचारणीय विषय है !

इस व्रत के विषय में कहा गया है कि, वैदिक अथवा पौराणिक काल में माताओं (स्त्रियों) ने गौतम ऋषि से ( उस गौतम ऋषि से, जिसने एक व्यभिचारी पुरुष द्वारा छल से दुराचार करने पर, अपनी उस पत्नी को, जो “किसी की पुत्री थी”, उसके निर्दोष रहने पर भी उसे वर्षों तक “पत्थर की तरह” रहने पर बाध्य कर दिया था) पूछा कि “भविष्यन्ति कथं सुतवालमाश्चिर विद्य: ? प्राप्ते$स्मिन्दारुणे काले कथं जिवन्ति पुत्रका ? अर्थात् – क्या, माताओं के जीवित रहते ही पुत्र की मृत्यु हो जाएगी ? उनके पुत्र किस प्रकार जीवित रहेंगे ? तब उस ब्राह्मण ने कहा कि – “जीवपुत्रन्तदारस्य तस्या: पुता: सुशोभना, पृथ्विव्यां बहुशोजाता क्षितिपाश्चिर जीविन:// अर्थात् – जीवित पुत्रिका व्रत करो ! तो तुम्हारे पुत्र दीर्घायु होंगे ! इस किंवदंती कथा पर कितना विश्वास किया जाए, यह अलग विषय है परन्तु उस समय से प्रचलित पितृसत्तात्मक समाज में तब भी अपनी बेटियों के दीर्घायु अथवा मंगलकामना के लिए न तो माताओं को चिंता थी और न ही समाज के ब्राह्मणवादी वर्चस्व के व्यवस्थापकों ने इसकी कोई आवश्यकता समझकर कोई उपाय सुझाए। इसके अनंतर भी एक कथा के अनुसार – राजा जीमुतवाहन के संवेदनशीलता का है, जिसका हृदय मानवीय संवेदनाओं से लबालब भरा हुआ था। जिसमें दूसरों के लिए दया, करुणा का सागर हिलोरें लेता था। वह, जिसने दूसरों का जीवन बचाने के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देना चाहा था। जिसके हृदय के भाव – “पर हितु सरिस धरम नहीं भाई” शब्दों को चरितार्थ करता है। परन्तु आज के इस उत्तर आधुनिकतावादी युग में भी बेटियों के साथ भेद भाव दर्शाने वाले इस पर्व में न केवल बेटियों के प्रति जन्मदाताओं की उदासीनता और अवहेलना दिखती है बल्कि बेटियों के मन में हीन भावनाएं उत्पन्न करने में सहायक के रूप में सिद्ध होता है। अतः माताएं पुत्रियों के लिए भी उनकी मंगलकामना करें। इससे न केवल बेटियों का मनोबल बढ़ेगा बल्कि बेटियों का अथाह प्यार पाने के साथ, हृदय में एक ऐसी सुखद अहसास का आनन्द आएगा जिसे आप आयुपर्यन्त नहीं भुला सकेंगे। इसलिए इस व्रत को करनेवाले माता – पिता कृपया पुत्रों के कल्याण के साथ पुत्रियों के कल्याण हेतु मन्त्र को इस प्रकार पढ़ें, जिससे पुत्रों तथा पुत्रियों मं भेद न रहे !
“जीवित पुत्रिका महाभागे जीवन्तु मम संतानका:/आयुर्वधक्यं संतानांपात्युश्च मम सर्वदा”

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार हैं)

लेखक परिचय : इस आलेख के लेखक श्री महेंद्रनाथ गोस्वामी “सुधाकर” किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। ये हिंदी और खोरठा के जाने माने साहित्यकार होने के साथ साथ रंगमंच के भी उम्दा कलाकार हैं। झारखण्ड सरकार के कथा संगम, खोरठा रत्न, श्रीनिवास पानुरी खोरठा प्रबुद्ध सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित महेन्द्रनाथ की कई रचनाएँ देश के प्राय: सभी प्रमुख अखबारों, पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। इनके द्वारा खोरठा में लिखी कई किताबें झारखण्ड के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं।

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