कथा शिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की जयंती पर विशेष

कथा शिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की जयंती पर विशेष

शरतचन्द्र के सपनों का घर : सामताबेड़ का शरत कुटीर

रीतेश सराक

हुगली। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के देओल्टी रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर स्थित है सामताबेड़ ग्राम। जिसे अब लोग शरतचंद्र ग्राम के रूप में अधिक जानते हैं। इसी गांव में अवस्थित है शरतचंद्र के सपनों का घर।

सुकून भरी जिन्दगी और लेखन के लिए शरतचंद्र को शहरी कोलाहल से दूर किसी शांत सुरम्य जगह की जरूरत थी। हुगली जिले के देओल्टी के सामताबेड़ गांव में उन्हें एक जगह पसंद आई। यह स्थान रूपनारायण नदी के किनारे था। वहां मैदान, खेत, पोखर और हरे-भरे बाग़-बगीचे के साथ उन्होंने एक घर बनाया और सन‍् 1926 के आरंभ में वहां जाकर बस गए। यहीं पर उन्होंने ‘पथेर दावी’ (पथ के दावेदार) उपन्यास लिखा।

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बर्मी शैली का खूबसूरत नमूना है शरत कुटीर

कथा शिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की जयंती पर विशेष

सामताबेड़ का यह दो मंजिला मकान बर्मी शैली का है, जो आज भी मर्यादित रूप से सुरक्षित है। सन‍् 2010 से प. बंगाल हेरिटेज कमीशन एक्ट के तहत यह मकान अब ऐतिहासिक धरोहर है। यहां शरतचंद्र द्वारा व्यवहार में लायी जाने वाली कई वस्तुएं संजोयी गई हैं। लेखक के छोटे भाई प्रभासचंद्र जो बाद में रामकृष्ण मिशन से जुड़कर स्वामी वेदानंद बन गए थे, भी इसी घर में रहा करते थे। आज शरतचंद्र व उनकी पत्नी हिरण्यमयी देवी के साथ स्वामी वेदानंद की समाधि भी यहां देखी जा सकती है। मकान के मुख्य द्वार पर दो शिलापट्ट हैं। बायीं ओर उनके मन के उद्गार को लिपिबद्ध किया गया है जबकि दायीं ओर उनकी कालजयी कहानी ‘महेश’ के कुछ अंश उत्कीर्ण हैं। प्रांगण में लेखक की एक मूर्ति भी स्थापित है।

जीवन के आखिरी 12 साल बिताए सामताबेड़ में

शरतचंद्र  के जीवन के आखिरी 12 साल इसी घर में बीते। यहां उन्होंने कई उपन्यास व कहानियां लिखीं। इन 12 वर्षो में उन्होंने अभागीर स्वर्ग, बामूनेर मेय, रामेर सूमति, पल्ली समाज, श्रीकांत आदि कई उपन्यास लिखे। उन दिनों कई स्वंत्रता सेनानियों ने शरत चंद्र के घर पर गोपनीय तरीके से बैठक भी की थी। सुभाष चंद्र बोस, बिपिन बिहारी गांगुली, देशबंधु चितरंजन दास यहां अक्सर आते थे। चितरंजन दास ने जेल में जाने से पहले शरत चंद्र को राधा-कृष्ण की मूर्ति बतौर उपहार भेंट की थी, जो आज भी इस घर में सुरक्षित रखी हुई है।

उपन्यासों पर बनीं फिल्में भी हुईं काफी लोकप्रिय

उल्लेखनीय है कि शरतचन्द्र ने अपने जीवन में कई उपन्यास लिखे, उनमें प्रमुख थे पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकान्त, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर “पथेर दावी” उपन्यास लिखा गया। पहले यह “बंग वाणी” में धारावाहिक के रूप में निकाला फिर पुस्तकाकार छपा तो तीन हजार का संस्करण तीन महीने में समाप्त हो गया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया।  देवदास और चरित्रहीन जैसे उपन्यासों और कहानियों पर बांग्ला और हिंदी फिल्में बनीं जो काफी लोकप्रिय हुईं।

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