विशेष : प्रकृति पर्व करमा के अवसर पर प्रभाकर का विशेष आलेख

विशेष : प्रकृति पर्व करमा के अवसर पर प्रभाकर का विशेष आलेख

प्रकृति पर्व करम और हमारा समाज


प्रकृति पर्व करम और हमारा समाज

बहुरंगी भाषा संस्कृति एवं लोक परम्पराओं से रचा-बसा हमारा प्रदेश झारखण्ड, जहाँ के लोगों ने सदियों से जल-जंगल-जमीन और प्रकृति के साथ अन्तरंग और अटूट रिश्ता बना रखा है. कठिन-कठोर मेहनत भरे जीवन के सुख-दुःख और ख़ुशी-गम के विविध मनोभाव कैसे जीवंत हो उठते हैं, इसे शाश्वत देखना हो तो यहाँ के पर्व-त्योहारों में शामिल होकर महसूस किया जा सकता है-देखा जा सकता है.

 

करम परब झारखण्ड के मनभावन त्योहारों में एक है जिसमे बहन का भाई प्रेम तथा मनुष्य के प्रकृति प्रेम को झारखंडी समाज नाच-गाकर मनाता है.  बहनें अपने भाइयों के लिए मंगल-कामनाएं करती हैं. इन दो अटूट रिश्तों की भावना के स्वागत के लिए घर-परिवार समेत पूरा गाँव सहभागी बनकर एक दूसरे के प्रति मानवीय दायित्वों को निभाने के लिए वचनबद्ध होता है.  इसके साथ साथ अपने अस्तित्व के मूलाधार जल-जंगल-जमीन, पेड़-पहाड़ ही नहीं पूरी प्रकृति को अपना सहभागी बनाते हैं.

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जिस करम की डार (डाल) की बहनें पूजा करती हैं उसी करम की डार को काटने से पहले विधिवत उस पेड़ की पूजा करना और फिर उससे उसकी डार काटने की अनुमति मांगे जाने की परम्परा प्रचलित है. ऐसा चलन है कि करम डार को टांगी अथवा कटारी के एक ही वार से काट लेना है. वहीँ करम डार को गाड़ने के पहले बहनें जावा बुनती है. यहाँ जावा प्रतीक है खेती का, खेत की उर्वरा शक्ति बढाने हेतु याचन का. मूलतः करम डार को आँगन, अखडा या फिर गाँव के किसी पवित्र सार्वजनिक स्थल पर गाड कर ढोल, नगाड़े और मंदर की थाप के साथ साथ बांसुरी की धुन पर नाचते गाते हैं. बहने करम गोसाई से निवेदन कर गाती हैं :

“देहु-देहु करम गोसाई, देहु आसीस हे,

भैया मोर बाढतय, लाखो बरिस हे” ….

 

यह है मनुष्य की सामूहिकता का प्रतीक. इस दिन बहनें निर्जला उपवास करती हैं और फिर किसी किसी इलाके में रिवाज है कि भाई बहनों को प्रतीकात्मक रूप से खीरे से मारते हैं और बहनें उसी खीरे से फलाहार करती हैं. सात दिनों तक चलने वाले इस लोक पर्व के समापन में लोग गाते बजाते नजदीक के किसी तालाब, पोखरे या नदी तक जाते हैं और करम और जावा को प्रवाहित कर दिया जाता है.

लेखक परिचय : इस आलेख के लेखक प्रभाकर जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. राजनीति, साहित्य के अलावा समाज से जुड़े मुद्दों पर इनकी अच्छी पकड़ है और ये काफी मुखर भी हैं. समय समय पर इनकी लिखी कविताएँ, कहानियां और आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. ये सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं.

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