किस्सा ए दिनेश, चुनावी मैदान में गए नहीं और मार दिया चौका

किस्सा ए दिनेश, चुनावी मैदान में गए नहीं और मार दिया चौका

राजनीतिक आकांक्षा ने बना दिया है घुमंतु

अभय वर्मा

गिरिडीह : चौका और छक्का क्रिकेट मैदान में मारा जाता है या जीत और हार में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है, पर कोई बगैर चुनाव लड़े दल बदलने में चौका मारे तो थोड़ा अचरज होता है। रांची में नप के पूर्व अध्यक्ष दिनेश यादव ने मंगलवार की दोपहर भगवा चोला धारण कर लिया। यहां सबसे चकित करने वाली बात यह है कि दलगत आधार पर बगैर चुनावी मैदान में उतरे दिनेश यादव ने दल बदलने में चौका मार दिया। विदित हो कि यादव ने अपनी राजनीति की शुरूआत कांग्रेस से की थी। परिस्थिति ऐसी बदली कि विस चुनाव में कांग्रेस के हिस्से कुछ नही आना था, कांग्रेस से उम्मीद टूटी तो झाविमो का दामन थाम लिया। तब झाविमो उफान पर था। यहां भी उनकी आस पूरी होती नही दीख रही थी, समय की नजाकत को समझा और झामुमो की ओर पलटी मार गए। पर झामुमो में गिरिडीह से सुदीव्य कुमार व गांडेय से करमिला टुडु की दावेदारी के आगे यादव की एक नही चलेगी। गिरिडीह और गांडेय से अलग दिनेश यादव दूसरी जगह से दावेदारी करेंगे भी नहीं। हालांकि भाजपा में भी गिरिडीह व गांडेय में दल के कद्दावर नेता पूर्व से हैं। ऐसे में इनकी चुनौती कितनी कारगर होगी यह यादव के राजनीतिक आका पर निर्भर है।

अन्नपूर्णा व जानकी बनेंगे खेवनहार?

लोकसभा चुनाव में स्थिति ऐसी बदली कि कोडरमा के सांसद रहे रवीन्द्र कुमार राय का टिकट काट राजद की प्रदेश अध्यक्ष रही अन्नपूर्णा देवी को भाजपा का टिकट थमा दिया गया। पार्टी सूत्र की मानें तो तब राय राज्य के सीएम की आंख की किरकिरी बने हुए थे। कई मंच से सरकार की आलोचना के बाद सीएम को कोडरमा में ऐसे शख्स की तलाश थी जो पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरे और अन्नपूर्णा में भाजपा को वह तस्वीर नजर आयी। पर सवाल यह है कि क्या भाजपा में कोडरमा सांसद का कद इतना बड़ा हो गया है कि टिकट दिलाने की हैसियत रखती है? विधायक जानकी यादव भी संभवतः दिनेश के पैरोकार होंगे पर यह भी सच है कि भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल में किसी की टिकट की गारंटी नही है और वह भी तब जब देश में मोदी फैक्टर उफान पर हो।

स्थानीय विधायक से रहा है छतीस का आकंड़ा

व्यवसाय में स्थानीय विधायक व यादव के बीच वैसी प्रतिद्ववंता न हो पर दोनो के बीच राजनीतिक संबंध कभी मधुर नहीं रहे। नप अध्यक्ष रहते यादव ने कई मौके पर स्थानीय विधायक के साथ मंच साझा किया पर तब दोनों एक दूसरे की ओर देखना भी गंवारा नही करते थे। पर राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न दुश्मन, संभव हो बदली राजनीतिक स्थिति में दोनों के संबंध में भी बदलाव हो।

रवीन्द्र द्वय के हश्र से परेशान हैं भाजपा विधायक

विगत लोस चुनाव में रवीन्द्र द्वय का हश्र देख भाजपा विधायकों के होश फाख्ता है। रवीन्द्र पांडेय चुनावी जीत का छक्का मारने का ख्बाव देख रहे थे पर हाथ से टिकट छीन लिया गया। भविष्य की शंकाओं से सभी भाजपा विधायकों की रूह कांप रही है। ऐसे में किनकी नैया डूबेगी और कौन अचानक दल के खेवनहार होंगे कहना मुश्किल है। हालांकि भाजपा में फिलहाल शामिल होने का दौर चल रहा है और सभी को टिकट की उम्मीद है। सूत्र की मानें तो यादव की दिली ख्वाहिश है कि निर्भय शाहाबादी को किसी भी हाल में पटकनी दी जाय। पर शाहाबादी भी किसी के लिए इतने आसान टारगेट साबित नही होंगे। शाहाबादी के होठों पर तैरती मीठी मुस्कान के अब भी कई कायल है और विकास कार्य तो है ही।

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