मन्नत : ईश्वर पर अटूट विश्वास का नजरिया

मन्नत : ईश्वर पर अटूट विश्वास का नजरिया

“मन्नत”

मन्नत : ईश्वर पर अटूट विश्वास का नजरिया प्रभाकर

“क्या होगा इससे?” मन्नत की मौली बँधवाते हुए वह झुँझला गया था।

“यहाँ कहते हैं कि जो भी मांग कर ये धागा बाँध लो वो मन्नत जरूर पूरी होती है।”

“और तुमको इसपर यकीन है?”

“यकीन न करने की कोई वजह भी नज़र नहीं आती। ”

“ये बचपना है”

“मैं बूढ़ी हुई ही कहाँ हूँ अभी”

“ओफ्फो, चलो”

और दोनों आँखें मूँद कुछ बुदबुदा कर दो सिक्के भी प्रवाहित कर आये उस कल कल बहती नदी में…

“आखिर क्या माँगा तुमने अपने सिक्को को प्रवाहित करते हुए?” उसने अपनी उत्सुकता को थोड़ा छिपाते हुए पूछा था।

“मैं नहीं बताउंगी। ”

“अब ये क्या बात हुई”

“बुद्धू, मन्नत बता दो तो पूरी नहीं होती। ”

“भक, मत बताओ। मैं बताता हूँ मैंने क्या माँगा। मैंने माँगा कि तुम हमेशा मेरे साथ रहो। ऐसे ही बच्चों की तरह मुझसे ये सारे काम करवाती रहो, ऐसे ही मेरा हाथ पकड़ पहाड़ों की ऊँचाइयों में भटकती रहो, ऐसे ही…”

“बस ना बाबा! नहीं बताओ ना।”

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अब जब कभी अकेले भटकते वह किसी मंदिर के दरवाजों पर बंधे ये धागे देखता है, किसी को पानी मे सिक्के डालकर मन्नत मांगते देखता है तो उसे लगता है शायद वो सही थी। शायद ये कच्चे धागे सच्चे होते हैं। शायद वो मन्नत बताकर उसने ग़लत किया था। शायद वह चुप रहा होता तो वो भी यहीं होती और दोनों एक साथ एक और धागा बाँधने और सिक्के डालकर मन्नत मांगने को उलझ रहे होते….

वह कभी कभी सोचता है कि वो एक और दफ़ा मिल जाए तो उससे यही सवाल पूछे, “क्या उस रोज़ तुमने यही माँगा था कि मैं तुम्हें कभी भूल न सकूँ? क्या तुम्हारी मन्नत उन धागों ने पूरी कर दी है?”..

(लेखक परिचय :- इस कहानी के लेखक प्रभाकर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विषयों पर इनकी गहरी पकड़ है। इनकी लिखी कविताएं और कहानियां कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं)

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