वर्तमान जल संकट : कृत्रिम या प्रकृति का कहर

वर्तमान जल संकट : कृत्रिम या प्रकृति का कहर

मित्र-सहपाठियों संग एकांत स्थान पर बैठकर जब 90 के दशक से पहले और आज पर चिंतन करते हैं, तब एहसास होता है, हमने अपने स्वार्थ के लिए ग्लोबल वार्मिंग को न्योता भेजा और आने वाली पीढ़ी को बिना वृक्ष, बिना अन्न-पानी के अकाल मृत्यु की ओर धकेल रहे हैं।

हम अपने मौजूदा संसाधनों का दोहन कर भविष्य के खतरे को प्रबल करने का काम कर रहे हैं, आज भी भविष्य में आने वाले संकट और समय के कुचक्र को समझ नहीं पा रहे। और यदि समझ भी रहे हैं तो सिर्फ हाथ पर हाथ रखे हर क्षण देख रहे हैं। जैसे कई तरह के पशु-पक्षियों की कहानी हम दादी-नानी से सुना करते थे, भविष्य में हम प्राकृतिक सुंदरता और जलस्रोतों की कहानी अपने बच्चों को सुनाएंगे।

आधुनिकता के दौर में मैं खुद बहुत ही आलसी और लोभी बन गया हूँ। अपनी स्वार्थी सोच के चलते लिख कर, किसी चौराहे पर चार लाइन चर्चा कर पल्ला झाड़ने का काम बखूबी निभा रहा हूँ।

लेकिन यदि लोग कुछ पल निकालकर आगे बढ़ें, तब उनके साथ कदम से कदम मिलाने में शायद कोई पीछे हटेगा। दूर से भी कोई प्रयास करें, मैं तन्मयता से उनके साथ चल चलूंगा, आशा है कहीं ना कहीं कुछ हल निकले कहीं से।

बातों ही बातों में कुछ अच्छी यादों के बीच हमें जहां तक याद है जब धरती में सुराख करने की मशीनें नहीं थी,अधिक पाने के लिए डीप बोरिंग का लोभ नहीं था, उस समय 250-300 आबादी वाले मुहल्ले में एक कुएं से सैकड़ों लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पानी का उपयोग करते थे, खेती-बाड़ी कपड़े धोना, नहाना सारे कार्य एक ही कुएं से होता था।

मेरा मुहल्ला भी कुछ ऐसा ही था। उस समय शायद ही किसी वर्ष या महीने में पानी की किल्लत सुनने को मिलती थी।

मेरे मुहल्ले से गुजरने वाली नदी में सालोंभर कुछ-कुछ पानी रहता था। नदी की रेत में हाथों से चुवाँ खोद कर घर के लिए पानी लाते थे, खेल-खेल में प्यास लगने पर हम सब साथी भी चुवाँ से ही प्यास बुझाया करते थे। बरसात के समय नदियों के किनारे स्थित मिट्टी का लेप लगाकर साबुन से अच्छी मैल छुड़ाया करते थे।

फिर हम समय के साथ स्वार्थी बनते गए। नदी में सामूहिक स्नान झूठे शान को चिढ़ाने लगा, मोहल्ले में गली-दर-गली चापानलों की परंपरा शुरू हुई, जो आगे चलकर धीरे-धीरे घरों के अंदर सिमटती चली गयी। आज हर घर में बोरिंग है, इसमें मैं भी शामिल हूँ। कभी 25 से 30 फीट का कुआं पानी की किल्लत महसूस नहीं होने देता था,अब 250-300 फीट डीप बोरिंग के बाद भी गर्मियों में पानी बिना हम सभी जूझ रहै हैं।

खैर दु:खी सब हैं, लेकिन अभी भी यह बदस्तूर जारी है, घनी आबादी से जंगल खत्म हुए, जिन मिट्टियों पर कबड्डी खेला करते थे, अब कंक्रीट से भरा जंगल है।

कभी जो 100% शुद्ध जल था, आज हमारे घरों से निकलने वाले नालों से मल-मूत्र, अनेकों केमिकल से जीवनदायिनी नदी अब विषैली है।

पैसा कमाने के लिए धरतीमाता का श्रृंगार(पहाड़), तन के कपड़े(पेड़), शरीर की त्वचा(बालू-मिट्टी) को दोनों हाथों से लूटे जा रहे हैं।

अब तो मौसमी फल वाले वृक्ष, ऋतु का अहसास दिलाने वाले पौधे धीरे-धीरे कहीं ना कहीं विलुप्त होते जा रहे हैं।

यह हमारे भविष्य के लिए बहुत ही गंभीर विषय है। “अफसोस हम भी सिर्फ लिख सकते हैं हमेशा की तरह”।

“रामजी”

अध्यक्ष

साउंड एसोसिएशन

गिरिडीह

(लेख पूर्णतः लेखक के निजी विचारों पर आधारित है)

 

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