चुनाव विश्लेषण : दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है....
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चुनाव विश्लेषण : दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है….

चुनाव विश्लेषण : दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है....  प्रभाकर

कोडरमा लोकसभा क्षेत्र से भाकपा माले प्रत्याशी वामपंथी नेता राजकुमार यादव अपनी हार या फिर 2014 में राजधनवार सीट फतह कर विधायक बन जाने का शायद ‘रियल फैक्टर’ डिटेक्ट नहीं कर पाए। दरअसल गिरिडीह जिले के दो विधानसभा क्षेत्र, पहला बगोदर और दूसरा धनवार इन्हीं दो क्षेत्रों से वामपंथी पार्टियां जीतती है जबकि दोनों इलाकों की राजनीतिक पकड़ में आसमान जमीन का फर्क है।

आप कभी बगोदर विधानसभा वाले क्षेत्र में खेतों-खलिहानों-चौराहों-सड़कों पर चले जाइये तो वहां के लोगों के बड़े वर्ग के चेहरे पर वामपंथ दिखेगा अर्थात संघर्षशीलता, आंदोलनरत, खुलापन, हक-ओ-हुक़ूक़ के लिए हमेशा तैयार रहने वाला वर्ग.. या यूं कहें कि ‘वर्ग संघर्ष’ की हर घूंटी वहां के अधिकांश चेहरों पर दिखेगी, हालांकि अब धीरे-धीरे वह भी दरकती दिख रही है। वहीं दूसरी ओर धनवार विधानसभा क्षेत्र में शायद ही ऐसा दिखे। धनवार में सामान्यतः आपको ‘सामंती सोच’ के साथ-साथ ‘दासत्व भाव’  वाला भी कुनबा दिखेगा।

क्रांति, बदलाव या फिर संघर्ष का झंडा उस कदर इस क्षेत्र में बुलंद नहीं दिखेगा जैसा बगोदर क्षेत्र में। अब ऐसे में भी वामपंथ के झंडे के साथ राजकुमार 2014 में विधायक चुनाव जीत जाते हैं तो क्या यह कहा जाय कि उस वक्त की जीत वामपंथ की जीत थी? पर ऐसा शायद नहीं है, क्योंकि अगर वह वामपंथ की जीत होती तो फिर इस लोकसभा चुनाव में भी वह वोट ‘इनकैश’ हो जाता पर मामला सीधा इसके उलट हो गया। जबकि इसी चुनाव में राजकुमार यादव को धनवार की अपेक्षा बगोदर में ज्यादा मत मिले।

दरअसल मेरे हिसाब से 2014 में वामपंथी झंडे को धनवार क्षेत्र में मिला मत वामपंथ से कही ज्यादा जातिगत और ध्रुवीकृत वोट रहा होगा जो इस बार उसी रूप से भरभरा कर गिर गया। क्योंकि इतने लंबे समय तक क्षेत्र विशेष में काम करने के बावजूद भी नेताजी या तो अपनी विचारधारा का वोट समेत नहीं पाए या फिर विचारधारा को जड़ तक फैला नहीं पाए।

इस बार के चुनाव में स्वजातीय वोट और साम्प्रदायिक धुर्वीकरण वाला वोट वामपंथी धड़े वाली पार्टी माले को नहीं मिल पाया। हालांकि गौर करने वाली बात है कि गौरक्षा आंदोलन की चपेट में आये मुसलमानों के पक्ष में संघर्ष करने वाली पार्टियों में माले एवं अन्य वामपंथी पार्टियां ही अकेली  थी। अन्य विपक्षियों का इस मुद्दे पर कहीं कोई धरना प्रदर्शन नहीं दिखा।  कुछ मुस्लिम संगठन माले के साथ मिलकर मोब लिंचिंग के खिलाफ सड़क पर उतरा था। लेकिन इसे मौकापरस्ती कहें या दुर्भाग्य, चुनाव में माले से ताकतवर जेवीएम को मानकर साम्प्रदायिक धुर्वीकरण वाला वोट उस ओर चला गया। माना जाता है कि यह वोट हमेशा निगेटिव होता है और बीजेपी को हराने के लिए किसी के भी पक्ष में जा सकता है।

अब अगर ऐसे में नेताजी को यह लगने लगे कि आयोग ने गड़बड़ी कर उन्हें हरा दिया तो शायद यह खुद को दिलासा देने वाली ही बात होगी।

(परिचय : प्रभाकर सरकारी संस्थान में कार्यरत हैं। सोशल मीडिया पर पर्दाफाश नामक ग्रुप के संचालक हैं और राजनीतिक व सामाजिक घटनाओं पर बेबाक टिप्पणी के लिए चर्चित हैं)

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