विशेष : इबादत की रात "शब-ए-बारात" यानी गुनाहों से निजात की रात
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विशेष : इबादत की रात “शब-ए-बारात” यानी गुनाहों से निजात की रात

रिपोर्ट- आबिद अंजुम

शब-ए-बारात मजहबे इस्लाम का बहुत ही खास त्योहार है। इस पर्व का इस्लाम में बहुत अज़ीम मर्तबा है। यह त्योहार इस्लामी कैलेंडर के शाबान महीने के 14 तारीख की शाम से मनाया जाता है। शाम के समय फातिहाखानी आदि का एहतमाम किया जाता है और रात ढलने के बाद पूरी रात खुदा के बंदे अपने रब की इबादत में मशगूल रहते हैं। मुस्लिम धर्मावलंबी पूरी रात खुदा की बारगाह में सजदा रेज रहते हैं और कुरान की तिलावत कर अपनी गुनाहों से मगफिरत (निजात) की दुवाएँ मांगते हैं।

इस पर्व को लेकर मुस्लिम धर्मावलंबियों में खासा उत्साह का माहौल पाया जाता है। लोग शाम से ही जहाँ एक तरफ फ़ातिहाखानी और नजरो नियाज में मशगूल हो जाते हैं। वहीं रात को मस्जिदों और कब्रिस्तानों में लोगों का हुजूम इबादत के लिए उमड़ पड़ता है। मुस्लिम समुदाय के लोग अपने घरों में हलवा आदि बना कर फातिहाखानी करवाते हैं। साथ ही रात को अपने आस पास के मस्जिदों और कब्रिस्तानों में जाकर रब की इबादत करते हैं।

रखे जाते हैं रोज़े

शब-ए-बारात के मौके पर मुस्लिम धर्मावलंबी दो रोज़े (उपवास) भी करते हैं। पहला रोज़ा शाबान के 14 तारीख को और दूसरा रोज़ा रात भर रब की इबादत के बाद 15 तारीख को रखा जाता है। कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं के अनुसार रात की इबादत के बाद का रोज़ा ही जरूरी बताया जाता है।

मुस्लिम धर्मगुरुओं के अनुसार दिन भर रोजे की हालत में रहने के बाद पूरी रात रब की इबादत और फिर दूसरे दिन रोज़े की नीयत करना शब-ए-बारात को खास मर्तबा देता है। ऐसे हालत में रब की इबादत करने और दुवाएँ मांगने से अल्लाह अपने बंदे की सभी नेक दुवाएँ कबूल करता है।

विशेष : इबादत की रात "शब-ए-बारात" यानी गुनाहों से निजात की रात

गुनाहों से तौबा और निजात की है रात

शब-ए-बारात को गुनाहों से तौबा और निजात की रात भी कहा जाता है। बताया जाता है कि शब-ए-बारात के पहले इंसान को अपने गुनाहों से तौबा कर माफी मांग लेनी चाहिए। चूंकि इस रात को अल्लाह ने बहुत ही खास मर्तबा अता किया है। इस रात को अल्लाह अपने बंदे की तौबा को कबूल फरमाता है और दिल से गुनाहों से तौबा करने वाले बंदों के सारे गुनाहों को माफ कर देता है। मुस्लिम धर्मगुरुओं के मुताबिक अगर कोई इंसान सच्चे दिल से शब-ए-बारात में अपनी गुनाहों से तौबा कर माफी मांगता है तो अल्लाह उसकी सारे गुनाहों को धो डालता है। इसलिए मुसलमान शब-ए-बारात में पूरी रात नमाजें अदा कर और कुरान की तिलावत कर रब की इबादत में मशगूल रहते हैं, ताकि उनका रब उनसे खुश हो। इसलिए शब-ए-बारात को इबादत की रात भी कहा जाता है।

रौशनी और सजावट से जगमगाती हैं मस्जिदें

शब-ए-बारात के मौके पर मुस्लिम धर्मावलंबी अपने अपने घरों, मस्जिदों और कब्रिस्तानों में रोशनी का प्रबंध करते हैं। लोग घरों में रोशनी कर सजाते हैं। वहीं मस्जिदों को भी दुल्हन की तरह सजाया जाता है और कब्रिस्तानों में रोशनी का इंतेजाम किया जाता है। पूरी रात लोग मस्जिदों में इबादत के साथ कब्रिस्तानों में जाकर अपने (साबेकीन) पूर्वजों के लिए भी मगफिरत की दुवाएँ मांगते हैं। घरों से लेकर मस्जिदों और मस्जिद से लेकर कब्रिस्तानों तक रौशनी ही रौशनी बिखरी रहती है और रात भर लोगों की चहलकदमी बनी रहती है।
कुल मिलाकर शब-ए-बारात मजहबे इस्लाम का बहुत ही खास त्योहार है और यह त्योहार इबादत के लिए खास मशहूर है। शब-ए-बारात के मौके पर जहाँ लोग एक दूसरे को मुबारकबाद पेश करते हैं वहीं हर मुसलमान एक दूसरे से अपनी गलतियों की माफी भी तलब करते हैं।

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