सरहुल विशेष : ‘फूल गईल शरई फूल, सरहुल दिना आबे गुईयाँ…..’

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“सरहुल”

झारखण्ड प्रदेश में मूलनिवासियों का सांस्कृतिक धरोहर : सरहुल प्रभाकर

गिरिडीह : प्रकृति का वसंत ऋतू की अंगडाई के साथ महुआ की खुशबु और पलास के मनमोहक रंगीन फूलों के साथ मदमस्त हो जाना…. और फिर हमें भी अपने इस उत्सव में सामिल होने का न्योता देती प्रकृति का खुद हमारे लिए शाल के पेड़ों पर शरई या सलई या शालिनी का गुलदस्ता भेजना… खुला आसमान, कोयल की मीठी कुक, चिड़ियों की चहचाहट, फूलों से ढकी बगैर पत्तों का पलास…. बस यही तो है सरहुल…

मूलतः सरहुल दो मुंडारी शब्दों का समायोजन है, पहला ‘शरई’ और दूसरा ‘हल’.. शरई का अर्थ शाल का फुल और हल का अर्थ गुलदस्ता यानि शाल के फूलों का गुलदस्ता…

झारखण्ड प्रदेश में मूलनिवासियों का सांस्कृतिक धरोहर : सरहुल

यह मात्र एक उत्सव ही नहीं बल्कि झारखण्ड प्रदेश का सांस्कृतिक धरोहर भी है जो यहां की सभ्यता-संस्कृति और पर्यावरण का ‘बेक-बोन’ है. 

विशुद्ध रूप से इस उत्सव प्रकृति को सर्वशक्तिमान मान कर आराधना की जाती है एवं प्रकृति देव को खुश रखने के लिए बलि तक चढ़ाकर यही कामना की जाती है कि उनका पूरा समाज हर विपदाओं-आपदाओं से सुरक्षित हो एवं उपजों से घर-खलिहान भरा-पूरा रहे.

ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता का ख्याल रख कर उनके नाम पर सफेद बलि चढ़ायी जाती है जो पूर्णता और पवित्रता का प्रतिक है.  पहान पूर्व की पर देखते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहता है:  हे पिता,  आप ऊपर हैं, “यहाँ नीचे पंच है और ऊपर परमेश्वर है.  हे पिता आप ऊपर हैं हम नीचे.  आप की आंखे हैं, हम अज्ञानी हैं- चाहें अनजाने अथवा अज्ञानतावश हमने आत्माओं को नाराज किया है, तो उन्हें संभाल कर रखिए; हमारे गुनाहों को नजरंदाज कर दीजिए.”

झारखण्ड प्रदेश में मूलनिवासियों का सांस्कृतिक धरोहर : सरहुल

उत्सव के दौरान पहान प्रत्येक परिवार में जाकर सखूआ फूल सूप से चावल और घड़े से सरना जल वितरित करते हैं.  गाँव की महिलाएँ अपने-अपने आंगन में एक सूप लिए खड़ी रहती हैं.  सूप में दो दोने होते हैं.  एक सरना जल ग्रहण करने के लिए खाली होता है दूसरे में पाहन को देने के लिए हंडिया होता है.  सरना जल को घर में और बीज के लिए रखे गए धन पर छिड़का जाता है.  मजेदार बात है कि पाहन  अपने हिस्से का हंडिया प्रत्येक परिवार में पीना नहीं भूलते.

 नहलाया जाना और प्रचुर मात्रा में हंडिया पीना सूर्य और धरती को फलप्रद होने के लिए प्रवृत करने का प्रतीक है.  सरहुल का यह त्यौहार कई दिनों तक खिंच जाता  है चूंकि बड़ा मौजा/गावं  होने से फूल, चावल और आशीषजल के वितरण में कई दिन लग जाते है.

जीवन के श्रोत, पवित्र ईश्वर को वे शुद्ध जल अर्पित करना..  नया घड़ा  सबकी नजरों से बचाकर सरना तक पहूँचाना.. पहान द्वारा उपवास करना आदि उनकी पवित्रता के मनोभावों की ही दर्शाते हैं.  कई चेंगनों की बलि गाँव के बच्चें- बच्चियों का प्रतीकात्मक चढ़ावा है जिसके द्वारा उनकी सुरक्षा और समृद्धि की कामना की जाती है.  

सर्वोच्च ईश्वर के लिए मात्र सफेद बलि भी पवित्रता और पूर्णता का बोध कराती है. पहान और उसकी पत्नी की प्रतीकात्मक शादी,  जल उड़ेला जाना,  हंडिया पिलाना आदि  धरती और आकाश अथवा सूर्य की शादी,  अच्छी वर्षा की कामना,  उर्वरा और सम्पन्नता की कामना का प्रतिक है. फूल, चावल आर सरना जल खुशी, पूर्णता, जीवन और ईश्वर की बरकत का बोध कराते हैं.

सरहुल पर्व में प्रयुक्त कुछ प्रतीकों पर गौर किया जाए तो आदिवासियों की प्रकृति प्रेमी अध्यात्मिकता, सर्वव्यापी ईश्वरीय उपस्थिति का एहसास,  ईश्वरीय उपासना में सृष्टि की सब चीजों,  जीव- जन्तुओं आदि का सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्वा का मनोभाव निखर उठता है.

पर अफ़सोस वैश्विकरण के इस दौर ने कथित विकास की गाथा लिखने के क्रम में सरहुल जैसे प्रकृति उत्सवों लगातार हमला हो रहा है. शहरीकरण के दौर में बेतहाशा जंगलों की कटाई आने वाली पीढ़ियों को शायद इस शरई और पलास के फूलों से महरूम कर दे और वह कागज़ और प्लास्टिक के बने कृत्रिम फूलों के सहारे इन उत्सवों को महज रिवाजों की तरह मनाने लगें और तब हमारी आने पीढ़ियों के लिए यह कौतुहल का विषय बन जाएगा कि आखिर उस दौर की हमारी माता-बहनें अपने बालों में असली शरई के फुल लगाकर और शरई के पत्तों को बालों में खोंसकर कितनी खुबसूरत दिखती होंगी..

अगर हमें आने वाली पीढ़ियों को भी विरासत के तौर पर अपने इन उत्सवों की खुशियाँ देनी हो तो हमें प्रकृति संरक्षण का हर संभव प्रयास करना होगा…..     

(लेखक परिचय :  प्रभाकर,  विधि स्नातकोत्तर, अर्गाघाट रोड गिरिडीह)