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झारखंड-बिहार में लाल झंडा बीमार, इंकलाबी एजेंडे से नहीं सध रही सियासत

लाल दुर्ग रहे नाला, सिंदरी, बेगूसराय, सहार, संदेश, पीरपैंती, बरौनी, बेनीपट्टी में हालत कमजोर

दोनों राज्यों के कई क्षेत्रों में अब चुनाव में पड़ने लगा है उम्मीदवारों का टोटा

झारखंड, बिहार, बीमार, सियासत, वामपंथी दल लाल दुर्ग रहे नाला, सिंदरी, बेगूसराय, सहार, संदेश, पीरपैंती, बरौनी, बेनीपट्टी में हालत कमजोर दोनों राज्यों के कई क्षेत्रों में अब चुनाव में पड़ने लगा है उम्मीदवारों का टोटा अमित राजा झारखंड और बिहार में लाल झंडा उदास है। संघर्ष और आंदोलनों से कभी दमकने वाला वामपंथी कैडरों का चेहरा भी मलीन है। वैसे, एक समय ऐसा भी था जब नाला, सिंदरी, बेगूसराय, सहार, संदेश, पीरपैंती, बरौनी, जाले, घाटशिला, बरकट्ठा, बड़कागांव, बगोदर, सिल्ली, जमुआ, झरिया, ओबरा, पीरो समेत कई विधानसभा क्षेत्र लेनिन ग्राद कहलाता था। 90 के दशक में झारखंड-बिहार के करीब 40 विधानसभा सीटों पर लाल झंडा फहरा करता था। यहां कम्युनिस्ट पार्टियों के विधायक थे। आंकड़ों पर गौर करें तो ऐसा भी वक्त कई बार आया है, जब अविभाजित बिहार के 318 विधानसभा सीटों में से करीब सौ सीटों पर वाम दलों के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे। बेगूसराय लाल झंडे का सबसे मजबूत किला रहा, मगर यह किला भी भरभरा कर गिर गया। कुछ दशक पहले वाम दलों के जीते हुए कुछ विधानसभा क्षेत्रों में कई ऐसे हैं, जहां आज कम्युनिस्ट पार्टियों को उम्मीदवारों का भी टोटा है। जमानत बचा पाना तो दूर की बात है। दोनों ही राज्यों में 70-80 के दशक में सभी जिले और प्रखंड मुख्यालयों में पार्टी दफ्तर हुआ करता था। आदिवासियों-दलितों या गरीबों पर जुल्म ढाने वाले लाल झंडे देख भाग खड़े होते। मगर, लाल झंडे की यह पहचान खो गयी। आज वामपंथी नेता संगठन की ऐसी हालत का दोष कुछ ऐतिहासिक गलतियों को देते हैं। कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति ने वाम दलों को कमजोर किया। जातीय और क्षेत्रीय राजनीति करने वाली ताकतों से जबतक वामदलों ने लोहा लिया, वे बचे रहे। लेकिन, क्षणिक लाभ में जैसे ही वामदलों ने क्षेत्रीय राष्ट्रीयता की बात करने वाली पार्टी झामुमो के मुद्दों को समर्थन दिया, कम्युनिस्ट पार्टी झारखंड के सिंघभूम और संताल परगना में कमजोर हो गयी। इसी तरह जातीय राजनीति करने वाले लालू प्रयाद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल (अब राजद) के जातीय मुद्दे को वामदलों ने अपना सवाल बनाया तो भारी नुकसान उठाना पड़ा। बाद में तो नुकसान की भरपाई के लिए वामदलों को इनका पिछल्लग्गू बन जाना पड़ा। लेकिन, नुकसान जारी है। कभी आबाद था पार्टी ऑफिस, अब निशान तक नहीं झारखंड-बिहार के लगभग जिलों में पार्टी का दफ्तर 24 घंटे काम करता था। सभी मसलों पर जीवंत बहसों का दौर चलता। इंसाफ के लिए लोग दफ्तर पहुंचते तो पार्टी होल टाइमरों पर उनकी लड़ायी को निर्णायक लक्ष्य तक पहुंचाने की जवाबदेही होती। लेकिन, ज्यादातर जिलों में पार्टियों के दफ्तर के निशान तक अब मौजूद नहीं हैं। एक समय था जब झारखंड के औद्योगिक जिले धनबाद और जमशेदपुर इस्ट और वेस्ट में वामपंथी विधायक थे। हाईप्रोफाइल विधानसभा सीट सिल्ली वामपंथ का गढ़ था। गिरिडीह, दरभंगा, मुजफ्फपुर, बेगूसराय, पूर्णिया, कटिहार, मोतीहारी, बक्सर जैसे शहरी विधानसभा सीटों पर भी वामदलों के विधायक थे। मगर, इन जगहों में से कई ऐसे भी हैं, जहां आज पार्टी का दफ्तर तक नहीं है। दफ्तर अगर है तो खुलता नहीं। कैडर तक नहीं हैं। अब विचार से मार्क्सवादी कभी-कभार संगोष्ठी व सभा-संगत में ही बोलते दिखते हैं। लेकिन, बौद्धिक गतिविधियों की दिशा भी बदली है। इन बौद्धिक गतिविधियों के केंद्र में अब मार्क्स न होकर अंबेदकर, गांधी व लोहिया आ गये हैं, जिसे वामपंथी स्वीकार करने पर भी मजबूर हैं। जिन जगहों पर वामदलों के उम्मीदवार ने 8 से 10 बार जीत दर्ज की उनमें नाला से विशेश्वर खां, पीरपैंती से अंबिका प्रसाद, बरौनी से एस सिंह व अन्य, बेनीपट्टी से टीएन झा जैसे नेता शामिल रहे हैं। मगर, आज संगठन यहां कमजोर है। इन जगहों पर मजबूत था वामदल नाला, सिंदरी, बेगूसराय, सहार, संदेश, पीरपैंती, बरौनी, बेनीपट्टी के अलावा झारखंड बिहार के कई विधानसभा सीटों में लाल परचम फहरा करता था। ऐसे क्षेत्रों में चनपटिया, मोतीहारी, केसरिया, मीरगंज, मैरवां, दरौली, जलालपुर, हरलाखी, खजौली, बिस्फी, लौकाहा, जाले, बिभूतपुर, बेगूसराय, बचवारा, बखरी, खपौली, पूर्णिया, महेशपुर, धुरैया, चौथम, सिकंदरा, इस्लामपुर, बिक्रम, संदेश, बक्सर, राजपुर, भभुआ, रफीगंज, ओबरा, बगोदर, निरसा, बहरागोड़ा, कांटी, मुजफ्फरपुर, सिल्ली, बड़कागांव, बरकट्ठा, जुगसलाई, देवघर, जामताड़ा, पाकुड़, घाटशिला आदि रहे हैं। इसके अलावा करीब सौं से ज्यादा ऐसी सीट भी रही जहां वामदल दो नंबर की पोजिशन में रहे। इनमें कुछ जगहों पर आज भी वामदल संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन ज्यादातर क्षेत्र ऐसे हैं जहां नियमित पार्टी दफ्तर नहीं खुलते या फिलहाल बंद हो चुके हैं। भाकपा, माकपा, माले के अलावा झारखंड बिहार में तीन जगहों पर फॉरवर्ड ब्लॉक और एक जगह पर एसयूसीआई के विधायक भी रह चुके हैं। लेकिन, इन दोनों दलों की स्थिति आज ऐसी नहीं हैं, जहां उनके विधायक चुने जा सके। कब-कब रहे कितने विधायक वर्ष 1995 में वामदलों के अविभाजित बिहार झारखंड से 40 विधायक चुने गये। इसमें भाकपा के 26, माकपा के 6, माले के 6, मासस के 2 विधायक शामिल थे। 1990 में भाकपा के 23, माकपा के 6, आईपीएफ (अब भाकपा माले) के 7 और मासस के 2 उम्मीदवार जीत सके। मसलन 1990 में वामदलों के कुल 38 विधायक चुने गये। वर्ष 2015 में हालत कमजोर हुई। इस साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भाकपा, माकपा के एक भी विधायक चुने नहीं गये। हालांकि माले के तीन विधायक चुने गये। 2014 में झारखंड विधायक चुनाव में मासस के 1 और माले के 1 विधायक चुने गये। 2010 में हालत और खराब थी, जब बिहार से माले और सीपीएम के एक भी विधायक चुने नहीं गये। हालांकि भाकपा के एक विधायक चुने गये थे। 2009 में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में माले के एक और मासस के एक विधायक चुने गये। वर्ष 2005 में बिहार माले के 5, भाकपा के 3 और माकपा के 1 विधायक चुने गये थे। जबकि झारखंड में 2004 में हुए चुनाव में माले के एक और फॉरवर्ड ब्लॉक के एक विधायक चुने गये। वर्ष 2000 के अविभागजित बिहार झारखंड से माले के 6, भाकपा के 5, माकपा के 2 और मासस के 1 विधायक चुने गये। इससे पहले 1985 में हुए चुनाव में भाकपा के 12, माकपा के 1 एसयूसीआई के 1 मासस के 1 विधायक चुने गये। जबकि 1980 के विधानसभा चुनाव में भाकपा के 23 माकपा के 6 एसयूसीआई के 1 मासस के 2 विधायक चुने गये। वर्ष 1977 में भाकपा के 21, माकपा के 4, मासस के 2 विधायक और 1972 भाकपा के 35 और मासस के 1 विधायक चुने गये थे। क्या रहे वामदलों के कमजोर पड़ने के कारण भाकपा (माले) नेता और एक्टू झारखंड राज्य कमेटी के सदस्य अरूण सहाय बड़ी साफगोई से झारखंड बिहार में वामदलों के कमजोर पड़ने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति में जातीय उभार और धार्मिक ध्रुवीकरण का असर वामदलों के संगठन पर पड़ा। वामदल हमेशा इंकलाबी एजेंडे पर काम करता रहा। वंचित जमात के संघर्षों की अगुवाई की। मगर, झारखंड में क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति और 90 के दशक में सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लालू प्रसाद यादव के साथ मोर्चाबंदी का वामदलों को नुकसान हुआ। भागलपुर दंगे का सबसे मुखर विरोध भाकपा ने किया। मगर, लालू प्रयाद यादव के साथ इन संघर्षों में मोर्चाबंदी थी। जिसका श्रेय लालू ने लिया और अल्पसंख्यक वोट लालू के पाले में चला गया। मोर्चाबंदी में साथ-साथ रहते रहते कई लोग जनता दल (अब राजद, जदयू) में शामिल हो गये। झारखंड आंदोलन को लेकर जो मोर्चाबंदी झामुमो के साथ हुई उसका भी नुकसान हुआ। अरूण सहाय की माने तो अब भी वामदलों के साथ चुनौतियां हैं। इससे बचने के लिए वामदलों को दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक मसले पर बेमेल मोर्चाबंदी से बचना चाहिए। लेखक हिंदी दैनिक इन्डियन पंच के कार्यकारी संपादक हैं अमित राजा

झारखंड और बिहार में लाल झंडा उदास है। संघर्ष और आंदोलनों से कभी दमकने वाला वामपंथी कैडरों का  चेहरा भी मलीन है। वैसे, एक समय ऐसा भी था जब नाला, सिंदरी, बेगूसराय, सहार, संदेश, पीरपैंती, बरौनी, जाले, घाटशिला, बरकट्ठा, बड़कागांव, बगोदर, सिल्ली, जमुआ, झरिया, ओबरा, पीरो समेत कई विधानसभा क्षेत्र लेनिन ग्राद कहलाता था।  90 के दशक में झारखंड-बिहार के करीब 40 विधानसभा सीटों पर लाल झंडा फहरा करता था। यहां कम्युनिस्ट पार्टियों के विधायक थे।

आंकड़ों पर गौर करें तो ऐसा भी वक्त कई बार आया है, जब अविभाजित बिहार के 318 विधानसभा सीटों में से करीब सौ सीटों पर वाम दलों के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे। बेगूसराय लाल झंडे का सबसे मजबूत किला रहा, मगर यह किला भी भरभरा कर गिर गया। कुछ दशक पहले वाम दलों के जीते हुए कुछ विधानसभा क्षेत्रों में कई ऐसे हैं, जहां आज कम्युनिस्ट पार्टियों को उम्मीदवारों का भी टोटा है। जमानत बचा पाना तो दूर की बात है।

दोनों ही राज्यों में 70-80 के दशक में सभी जिले और प्रखंड मुख्यालयों में पार्टी दफ्तर हुआ करता था। आदिवासियों-दलितों या गरीबों पर जुल्म ढाने वाले लाल झंडे देख भाग खड़े होते। मगर, लाल झंडे की यह पहचान खो गयी। आज वामपंथी नेता संगठन की ऐसी हालत का दोष कुछ ऐतिहासिक गलतियों को देते हैं।

कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति ने वाम दलों को कमजोर किया। जातीय और क्षेत्रीय राजनीति करने वाली ताकतों से जबतक वामदलों ने लोहा लिया, वे बचे रहे। लेकिन, क्षणिक लाभ में जैसे ही वामदलों ने क्षेत्रीय राष्ट्रीयता की बात करने वाली पार्टी झामुमो के मुद्दों को समर्थन दिया, कम्युनिस्ट पार्टी झारखंड के सिंघभूम और संताल परगना में कमजोर हो गयी।

इसी तरह जातीय राजनीति करने वाले लालू प्रयाद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल (अब राजद) के जातीय मुद्दे को वामदलों ने अपना सवाल बनाया तो भारी नुकसान उठाना पड़ा। बाद में तो नुकसान की भरपाई के लिए वामदलों को इनका पिछल्लग्गू बन जाना पड़ा। लेकिन, नुकसान जारी है।

कभी आबाद था पार्टी ऑफिस, अब निशान तक नहीं

झारखंड-बिहार के लगभग जिलों में पार्टी का दफ्तर 24 घंटे काम करता था। सभी मसलों पर जीवंत बहसों का दौर चलता। इंसाफ के लिए लोग दफ्तर पहुंचते तो पार्टी होल टाइमरों पर उनकी लड़ायी को निर्णायक लक्ष्य तक पहुंचाने की जवाबदेही होती। लेकिन, ज्यादातर जिलों में पार्टियों के दफ्तर के निशान तक अब मौजूद नहीं हैं। एक समय था जब झारखंड के औद्योगिक जिले धनबाद और जमशेदपुर इस्ट और वेस्ट में वामपंथी विधायक थे।

हाईप्रोफाइल विधानसभा सीट सिल्ली वामपंथ का गढ़ था। गिरिडीह, दरभंगा, मुजफ्फपुर, बेगूसराय, पूर्णिया, कटिहार, मोतीहारी, बक्सर जैसे शहरी विधानसभा सीटों पर भी वामदलों के विधायक थे। मगर, इन जगहों में से कई ऐसे भी हैं, जहां आज पार्टी का दफ्तर तक नहीं है।

दफ्तर अगर है तो खुलता नहीं। कैडर तक नहीं हैं। अब विचार से मार्क्सवादी कभी-कभार संगोष्ठी व सभा-संगत में ही बोलते दिखते हैं। लेकिन, बौद्धिक गतिविधियों की दिशा भी बदली है। इन बौद्धिक गतिविधियों के केंद्र में अब मार्क्स न होकर अंबेदकर, गांधी व लोहिया आ गये हैं, जिसे वामपंथी स्वीकार करने पर भी मजबूर हैं। जिन जगहों पर वामदलों के उम्मीदवार ने 8 से 10 बार जीत दर्ज की उनमें नाला से विशेश्वर खां, पीरपैंती से अंबिका प्रसाद,  बरौनी से एस सिंह व अन्य, बेनीपट्टी से टीएन झा जैसे नेता शामिल रहे हैं। मगर, आज संगठन यहां कमजोर है।

इन जगहों पर मजबूत था वामदल

नाला, सिंदरी, बेगूसराय, सहार, संदेश, पीरपैंती, बरौनी, बेनीपट्टी के अलावा झारखंड बिहार के कई विधानसभा सीटों में लाल परचम फहरा करता था। ऐसे क्षेत्रों में चनपटिया, मोतीहारी, केसरिया, मीरगंज, मैरवां, दरौली, जलालपुर, हरलाखी, खजौली, बिस्फी, लौकाहा, जाले, बिभूतपुर, बेगूसराय, बचवारा, बखरी, खपौली, पूर्णिया, महेशपुर, धुरैया, चौथम, सिकंदरा, इस्लामपुर, बिक्रम, संदेश, बक्सर, राजपुर, भभुआ, रफीगंज, ओबरा, बगोदर, निरसा, बहरागोड़ा, कांटी, मुजफ्फरपुर, सिल्ली, बड़कागांव, बरकट्ठा, जुगसलाई, देवघर, जामताड़ा, पाकुड़, घाटशिला आदि रहे हैं। इसके अलावा करीब सौं से ज्यादा ऐसी सीट भी रही जहां वामदल दो नंबर की पोजिशन में रहे।

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इनमें कुछ जगहों पर आज भी वामदल संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन ज्यादातर क्षेत्र ऐसे हैं जहां नियमित पार्टी दफ्तर नहीं खुलते या फिलहाल बंद हो चुके हैं। भाकपा, माकपा, माले के अलावा झारखंड बिहार में तीन जगहों पर फॉरवर्ड ब्लॉक और एक जगह पर एसयूसीआई के विधायक भी रह चुके हैं। लेकिन, इन दोनों दलों की स्थिति आज ऐसी नहीं हैं, जहां उनके विधायक चुने जा सके।

कब-कब रहे कितने विधायक

वर्ष 1995 में वामदलों के अविभाजित बिहार झारखंड से 40 विधायक चुने गये। इसमें भाकपा के 26, माकपा के 6, माले के 6, मासस के 2 विधायक शामिल थे। 1990 में भाकपा के 23, माकपा के 6, आईपीएफ (अब भाकपा माले) के 7 और मासस के 2 उम्मीदवार जीत सके। मसलन 1990 में वामदलों के कुल 38 विधायक चुने गये। वर्ष 2015 में हालत कमजोर हुई। इस साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भाकपा, माकपा के एक भी विधायक चुने नहीं गये। हालांकि माले के तीन विधायक चुने गये। 2014 में झारखंड विधायक चुनाव में मासस के 1 और माले के 1 विधायक चुने गये।

2010 में हालत और खराब थी, जब बिहार से माले और सीपीएम के एक भी विधायक चुने नहीं गये। हालांकि भाकपा के एक विधायक चुने गये थे। 2009 में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में माले के एक और मासस के एक विधायक चुने गये। वर्ष 2005 में बिहार माले के 5, भाकपा के 3 और माकपा के 1 विधायक चुने गये थे।

जबकि झारखंड में 2004 में हुए चुनाव में माले के एक और फॉरवर्ड ब्लॉक के एक विधायक चुने गये। वर्ष 2000 के अविभागजित बिहार झारखंड से माले के 6, भाकपा के 5, माकपा के 2 और मासस के 1 विधायक चुने गये। इससे पहले 1985 में हुए चुनाव में भाकपा के 12, माकपा के 1 एसयूसीआई के 1 मासस के 1 विधायक चुने गये। जबकि 1980 के विधानसभा चुनाव में भाकपा के 23 माकपा के 6 एसयूसीआई के 1 मासस के 2 विधायक चुने गये। वर्ष 1977 में भाकपा के 21, माकपा के 4, मासस के 2 विधायक और 1972 भाकपा के 35 और मासस के 1 विधायक चुने गये थे।

क्या रहे वामदलों के कमजोर पड़ने के कारण

भाकपा (माले) नेता और एक्टू झारखंड राज्य कमेटी के सदस्य अरूण सहाय बड़ी साफगोई से झारखंड बिहार में वामदलों के कमजोर पड़ने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति में जातीय उभार और धार्मिक ध्रुवीकरण का असर वामदलों के संगठन पर पड़ा। वामदल हमेशा इंकलाबी एजेंडे पर काम करता रहा।

वंचित जमात के संघर्षों की अगुवाई की। मगर, झारखंड में क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति और 90 के दशक में सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लालू प्रसाद यादव के साथ मोर्चाबंदी का वामदलों को नुकसान हुआ। भागलपुर दंगे का सबसे मुखर विरोध भाकपा ने किया। मगर, लालू प्रयाद यादव के साथ इन संघर्षों में मोर्चाबंदी थी। जिसका श्रेय लालू ने लिया और अल्पसंख्यक वोट लालू के पाले में चला गया। मोर्चाबंदी में साथ-साथ रहते रहते कई लोग जनता दल (अब राजद, जदयू) में शामिल हो गये।

झारखंड आंदोलन को लेकर जो मोर्चाबंदी झामुमो के साथ हुई उसका भी नुकसान हुआ। अरूण सहाय की माने तो अब भी वामदलों के साथ चुनौतियां हैं। इससे बचने के लिए वामदलों को दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक मसले पर बेमेल मोर्चाबंदी से बचना चाहिए।

लेखक हिंदी दैनिक इन्डियन पंच के कार्यकारी संपादक हैं

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7 Replies to “झारखंड-बिहार में लाल झंडा बीमार, इंकलाबी एजेंडे से नहीं सध रही सियासत

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